आहट-3


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संस्कार
लोकेश का ई-मेल मिले सप्ताह भर हो रहा था। अजय ने इस बीच कितनी ही बार अनिल से बात करने मोबाईल की ओर लपका, नम्बर लगाए या न लगाए , इस उधेड़बुन में उलझा रहा। मोबाईल से बात करूँ या आमने-सामने चर्चा करूँ। यही सोचते दिन बीत रहे थे। अंत में उसने निर्णय लिया कि मोबाईल पर बात करने की बजाय आमने-सामने बात करना ही उचित होगा। परंतु उसने अभी तक इस बारे में अनुभूति से बात नहीं की थी।
अनुभूति से अजय की परेशानी छुपी नहीं रह सकी थी , परंतु अनुभूति जानती थी कि वे पूछने पर कभी कुछ नहीं कहेंगे, स्वयं होकर बता दे तो अलग बात है। अनुभूति को याद है कि वह नई बहु बनकर इस परिवार में आई थी । अजय तब भिलाई के एक निजी स्कूल में शिक्षक था । वह रोज़ गाँव से भिलाई जाने निकल जाता था और देर शाम ही घर लौटता था। उस साल फ़सल ठीक से नहीं हुई तो घर की माली हालत बिगड़ने लगी। अजय हर माह अपनी पूरी तनख़्वाह माँ के हाथ में दे देता था। अचानक उसकी नौकरी चली गई । परंतु उसने यह बात घर में किसी से नहीं कही। वह पहले की तरह ही रोज़ सुबह घर से निकलता और देर शाम लौट आता।
एक दिन अजय के जाने के बाद सुरेंद्र घर आया और बताया कि अजय को रेडियंट स्कूल में इंटरव्यू के लिए बुलाया है। तब बड़े भैया ने बताया कि वह तो स्कूल गया है , तब सुरेंद्र ने कहा कि उसे तो चार माह पहले ही स्कूल से निकाल दिया गया है , वह कैसे स्कूल जा सकता है ।
अजय शाम को लौटा तो माँ और बड़े भैया उनसे बेहद नाराज़ थे। उनके लौटने पर सवालों की झड़ी लगा दी थी । तब अजय ने सिर्फ़ इतना ही कहा कि नौकरी चले जाने की बात कहकर वह किसी को परेशान नहीं करना चाहता था । फिर उसे दुर्ग स्टेशन के माल गोदाम में क़ुली का काम भी मिल गया था ।
अनुभूति तब बहुत नाराज़ हुई थी, उसने अजय के इस रवैए को लेकर क्या कुछ नहीं कहा परंतु अजय चुपचाप सुनता रहा।
अनुभूति जानती थी , इतने सालों में सब समझ चुकी थी कि अजय अपनी तरफ़ से कुछ नहीं बताएँगे। बड़ी से बड़ी परेशानी को वे अकेले झेल लेने की हिम्मत रखते हैं। परिवार के प्रति उनका प्रेम अथाह था। वे अपना वेतन में से पैसे बचाकर आज भी बड़े भैया को पैसा भेजते हैं , यह अलग बात है कि बड़े भैया कुछ न कुछ बहाने से वापस कर देते हैं। त्यौहारों में कपड़ा देना तो बड़े भैया के आदत में शुमार था। दिल्ली आने वालों के हाथ घर का बना पापड़ , बिजौरी, अचार के अलावा खाने पीने का व्यंजन और चावल-दाल तक भेज देते थे।
चावल-दाल भेजने पर कितनी ही बार अजय ने टोका था, परंतु बड़े भैया सिर्फ़ यही कहते छत्तीसगढ़ और घर के चावल का स्वाद वाला चावल पूरे दिल्ली में पिसान (आटा) बाँधकर ढूँढोगे तब भी नहीं मिलेगा।
अनुभूति भाइयों के इस प्रेम से अभिभूत थी। वह मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना भी करते रहती थी कि भाइयों का प्रेम बना रहे। परिवार को कभी किसी की नज़र ना लगे।
उसे याद है एक बार अनिल की तबियत कुछ ज़्यादा ही ख़राब हो गई थी, उसे सेक्टर-9 में भर्ती कराना पड़ा था। कैसे रात-रात भर जागकर दोनो भाई अनिल के सिरहाने बैठे रहते थे। उसे तो यह भी याद है कि अनुभूति का पहला बच्चा परम्परानुसार मायके में हुआ तब पूरा परिवार ख़बर सुनकर कैसे उनके मायके पहुँच गया था । अपने साथ क्या कुछ नहीं लाए थे, और जब वह इसके बाद गाँव गई तो पूरा परिवार उसे सिर पर उठा रखा था। छः माह तक उसे आड़ी का काड़ी करने नहीं दिया था। अजय की माँ के व्यवहार से उसे कभी नहीं लगा कि वह अपने माँ के पास नहीं है। बड़े भैया के बच्चे तो आज भी काकी माँ ही कहते हैं। ज़माना बदल गया है। बच्चे सब अंग्रेज़ी मिडियम में पढ़ रहे हैं, परंतु संस्कार अब भी क़ायम है, ज़िंदा है। सुबह उठकर नित्यकर्म से निवृत होकर भगवान के सामने दिया जलाना और कहीं जाने या कहीं से आने पर पैर छूना तो जैसे आदत हो गई है। अनुभूति ने भी अपने दोनो बच्चों को ऐसा ही संस्कार दिया है। दोनो बच्चे अब कालेज जाने लगे हैं परंतु कोई नहीं कहेगा कि इन्हें दिल्ली का रंग लग चुका है। गाँव उन्हें आज भी बहुत भाता है। छुट्टियों में वे गाँव जाने उतावले रहते है और अब तो दोनो भाई -बहन छुट्टी लगते  अकेले गाँव चले जाते हैं।
अनुभूति के सामने पुरानी बातें  चलचित्र की तरह एक-एक कर के आते जा रही थी। रायपुर के साईस कालेज में पढ़ी अनुभूति को पहले तो सब कुछ अटपटा लगा था। वह तो कभी कल्पना ही नहीं की थी कि उसे गाँव में रहना पड़ेगा। परंतु जब उसे पता चला कि शादी के बाद उसे गाँव में ही रहना है तो वह ख़ूब परेशान हुई थी । उसकी कई बार इच्छा हुई कि मम्मी-पापा से इस शादी के लिए साफ़ इंकार कर दे, परंतु उसकी कभी हिम्मत नहीं हुई। शादी के महीने भर बाद उसने एक दिन हिम्मत जुटाकर अजय से कहा कि जब नौकरी भिलाई में करनी है तब रोज़ के आने-जाने की परेशानी और ख़र्च की बजाय  वहीं किराए का मकान लेकर रहते हैं। परंतु अजय ने यह कहते हुए बड़ी सफ़ाई से बात टाल दी थी कि गाँव छोड़कर कहीं रहना होगा तो भिलाई दुर्ग क्यों ? किसी बड़े शहर में रहेंगे मुंबई-दिल्ली -आगरा-कलकत्ता।
अनुभूति ने पूछा था कब? तब अजय ने मुस्कुराते कहा था इंतज़ार करो , कई जगह नौकरी के लिए आवेदन दिए हैं, कहीं न कहीं नौकरी तो मिल ही जाएगी।
रायपुर इंजीनियरिंग कालेज से पास-आउट अजय के पहनावे या बातचीत से कभी नहीं लगा कि उसके पास इंजीनियरिंग की डिग्री है। वह भी प्रथम श्रेणी में। हर बात पर महात्मा गांधी को उद्धृत करने वाले अजय पर गांधी जी का बेहद प्रभाव था। सादा जीवन , उच्च विचार और संस्कार पर जीने वाले अजय को दिल्ली का पानी भी नहीं बदल पाया। दिल्ली में रहते दो दशक हो गए । केंद्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रम में अच्छा ख़ासा वेतन मिलने के बाद भी अजय की सादगी देखते ही बनती थी । कई दोस्त तो उन्हें मज़ाक़ में बापू कहकर भी चिढ़ाते थे , परंतु अजय ने उनकी बातों का कभी बुरा नहीं माना । दिल्ली आने के बाद अनुभूति ने ज़रूर अपने को बदला। साड़ियों की जगह सलवार सूट पहनने लगी लेकिन वह जब भी गाँव जाती है साड़ी ही पहनती है । एक बार बड़े भैया बग़ैर सूचना के अचानक दिल्ली आ गए। अनुभूति ने दरवाज़ा खोला  और जैसे ही बड़े भैया को सामने देखा , उसके होश उड़ गए, वह भागकर जल्दी-जल्दी साड़ी पहनकर आई। तब तक बड़े भैया दरवाज़े पर ही खड़े  रहे , इसके कुछ माह बाद जब वह गाँव गई तो उसे लगा कि बड़े भैया परिवार वालों को सलवार सूट की बात बता चुके होंगे, और अब सब उसका उपहास उड़ाएँगे। पर उसकी शंका निर्मूल साबित हुई । वह दिल्ली में सलवार सूट पहनती है यह बात  यहाँ किसी को पता ही नहीं था।
इस परिवार की यही तो ताक़त थी। बड़ी सी बड़ी ग़लती पर कोई कुछ नहीं कहता था । पीढ़ियों के अंतर की सोच को सहज रूप से स्वीकार कर उसकी अच्छाई और बुराई पर खुलकर बात होती थी। 
यही वजह है कि परिवार में संस्कार हावी है, और संस्कार की वजह से बड़े-छोटे में लिहाज़ व आँखो में शर्म हया बाक़ी है , जो रिश्तों को प्रेमपाश में बाँधकर रखा है ।

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